पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–3 / रक्षा / आंतरिक सुरक्षा
सन्दर्भ
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सैन्य स्वायत्तता तथा एल्गोरिथ्मिक युद्ध (Algorithmic Warfare) की त्रयी आधुनिक युद्ध संचालन तथा प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) को नए सिरे से परिभाषित कर रही है।
युद्धों में प्रौद्योगिकी का हालिया उपयोग
- रूस–यूक्रेन युद्ध ने दिखाया है कि कम लागत वाले एफपीवी (FPV) ड्रोन महँगे बख्तरबंद सैन्य वाहनों को भी नष्ट कर सकते हैं।
- नागोर्नो-काराबाख युद्ध ने पारंपरिक युद्ध में लोइटरिंग म्यूनिशन्स (Loitering Munitions) के निर्णायक प्रभाव को प्रदर्शित किया।
- गाज़ा पट्टी संघर्ष ने यह उजागर किया कि गैर-राज्यीय तत्व भी निगरानी तथा लक्षित हमलों के लिए वाणिज्यिक ड्रोन का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं।
- भारत ने भी हाल के अभियानों, जिनमें ऑपरेशन सिंदूर तथा पाकिस्तान के विरुद्ध जवाबी हमले शामिल हैं, में ड्रोन का उपयोग किया है।
आधुनिक युद्ध क्या है?
- आधुनिक युद्ध की विशेषता कम लागत, उच्च प्रभाव वाली प्रौद्योगिकियों, जैसे मानवरहित हवाई वाहन (UAVs), लोइटरिंग म्यूनिशन्स, स्वार्म ड्रोन (Swarm Drones) तथा लंबी दूरी की सटीक प्रहार प्रणालियों (Long-range Precision Strike Systems) का बढ़ता उपयोग है।
- स्वार्म सैचुरेशन (Swarm Saturation) का खतरा: एक ही समन्वित हमले में सैकड़ों ड्रोन की तैनाती ने स्वार्म हमलों से उत्पन्न गंभीर खतरे को स्पष्ट कर दिया है।
- ऐसे बड़े पैमाने के हमलों के सामने सबसे उन्नत वायु रक्षा प्रणालियाँ भी अपनी फायरिंग दर, अवरोधन क्षमता तथा पुनः लोड होने की गति जैसी सीमाओं का सामना करती हैं।
- भारत का ड्रोन-रोधी सिद्धांत (Counter-Drone Doctrine) अभी संक्रमणकालीन अवस्था में है तथा इसकी संचालनात्मक जिम्मेदारियाँ लगातार बढ़ रही हैं।
आधुनिक युद्ध को आकार देने वाली प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वास्तविक समय में खुफिया जानकारी के विश्लेषण, युद्धक्षेत्र के पूर्वानुमान, स्वचालित रसद प्रबंधन तथा निर्णय-सहायक प्रणालियों को सक्षम बनाती है।
- मानवरहित एवं स्वायत्त प्रणालियाँ: ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन्स तथा मानवरहित थल एवं नौसैनिक प्लेटफॉर्म ने निगरानी तथा आक्रमण क्षमताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है।
- साइबर एवं सूचना युद्ध: इसका लक्ष्य महत्त्वपूर्ण अवसंरचना, कमान एवं नियंत्रण प्रणालियों तथा सैन्य नेटवर्क पर आक्रमण करना होता है, जो अनेक बार शांति काल में भी संचालित किए जाते हैं।
- सूचना युद्ध में दुष्प्रचार अभियान, मनोवैज्ञानिक अभियान तथा जनमत एवं राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करने के उद्देश्य से कथानक नियंत्रण (Narrative Control) शामिल होते हैं।
- अंतरिक्ष-रोधी क्षमताएँ (Counter-Space Capabilities): अंतरिक्ष आधारित संसाधन नौवहन, प्रक्षेपास्त्र मार्गदर्शन, निगरानी तथा सुरक्षित संचार के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- उपग्रह-रोधी हथियार (Anti-Satellite Weapons), इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप तथा अंतरिक्ष मलबे के जोखिम ने अंतरिक्ष को एक प्रतिस्पर्धी एवं सैन्यीकृत क्षेत्र बना दिया है।
- सटीक-निर्देशित आयुध (Precision-guided Munitions) तथा हाइपरसोनिक हथियार न्यूनतम चेतावनी समय के साथ दूर से आक्रमण करने में सक्षम हैं, जिससे पारंपरिक प्रतिरोधक क्षमता तथा वायु रक्षा प्रणालियों के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं।
आधुनिक युद्ध से भारत के समक्ष उत्पन्न खतरे
- हाइब्रिड एवं ग्रे-ज़ोन चुनौतियाँ: भारत लगातार साइबर घुसपैठ, दुष्प्रचार अभियानों तथा प्रॉक्सी हिंसा जैसी ग्रे-ज़ोन रणनीतियों का सामना कर रहा है।
- डोकलाम (2017) तथा लद्दाख गतिरोध (2020) इस बात के उदाहरण हैं कि पूर्ण युद्ध के बिना भी दबाव एवं आक्रामकता प्रदर्शित की जा सकती है।
- साइबर एवं सूचना संबंधी कमजोरियाँ: सीईआरटी-इन (CERT-In) के आकलन के अनुसार भारत साइबर हमलों के सबसे अधिक निशाना बनाए जाने वाले पाँच देशों में शामिल है।
- दुष्प्रचार अभियान सामाजिक एकता, चुनावी प्रक्रियाओं तथा संस्थाओं में जनता के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं।
- समुद्री एवं अंतरिक्ष सुरक्षा जोखिम: भारत के कुल व्यापार का 90% से अधिक (मात्रा के आधार पर) समुद्री मार्गों से होता है, इसलिए समुद्री सुरक्षा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- अंतरिक्ष आधारित संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता भारत को ऐसे अंतरिक्ष-रोधी खतरों के प्रति संवेदनशील बनाती है, जो नागरिक सेवाओं एवं सैन्य अभियानों दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत की संस्थागत एवं रणनीतिक प्रतिक्रिया
- सैन्य आधुनिकीकरण एवं आत्मनिर्भरता: भारत ने वित्त वर्ष 2026–27 के केंद्रीय बजट में रक्षा पूंजीगत व्यय के लिए ₹2.19 लाख करोड़ (लगभग 23.9 अरब अमेरिकी डॉलर) का प्रावधान किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 21.84% अधिक है।
- तेजस, आकाश, पिनाका तथा सशस्त्र मानवरहित हवाई वाहन (Armed UAVs) जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म आत्मनिर्भरता तथा संचालनात्मक लचीलापन बढ़ाते हैं।
- संरचनात्मक सुधार: शेकटकर समिति की सिफारिशों के आधार पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) का पद सृजित किया गया, जिससे संयुक्त योजना एवं समन्वय को सुदृढ़ किया जा सके।
- प्रस्तावित एकीकृत थिएटर कमांड (Integrated Theatre Commands) का उद्देश्य बहु-आयामी संयुक्त सैन्य अभियानों को सक्षम बनाना है।
- एकीकृत ड्रोन पहचान एवं अवरोधन प्रणाली (IDD&IS): इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) तथा भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने विकसित किया है। यह एक व्यापक ड्रोन-रोधी प्रणाली है।
- यह प्रणाली 5–8 किमी की दूरी तक ड्रोन का पता लगाने, 2–5 किमी के दायरे में उनके संचार संकेतों को बाधित करने तथा निकट दूरी पर लेज़र आधारित निर्देशित ऊर्जा हथियारों से उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम है।
- “भार्गवास्त्र” एंटी-स्वार्म प्रणाली: सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (SDAL) द्वारा विकसित यह कम लागत वाली स्वदेशी ड्रोन-रोधी प्रणाली है, जो हार्ड-किल मोड में सूक्ष्म रॉकेटों (Micro-rockets) की सहायता से ड्रोन झुंडों को नष्ट करती है।
- भारतीय सेना ने अपनी रक्षात्मक तथा आक्रामक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए निगरानी ड्रोन तथा कामिकाज़े ड्रोन की बड़े पैमाने पर खरीद की प्रक्रिया प्रारंभ की है।
- रक्षा साइबर एजेंसी (DCA) तथा रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) की स्थापना के माध्यम से युद्ध के उभरते क्षेत्रों को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया गया है।
आगे की राह
- मजबूत ड्रोन-रोधी प्रणालियों की आवश्यकता: स्वार्म ड्रोन कम लागत वाले लेकिन अत्यधिक प्रभावशाली हथियार हैं, जो उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों को भी निष्प्रभावी कर सकते हैं।
- भारत को ऐसे किफायती ड्रोन-रोधी तंत्रों की खरीद को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो छोटे मानवरहित हवाई वाहनों का पता लगाने, उनके संकेतों को बाधित करने तथा उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम हों।
- रोबोटिक युद्ध क्षमताओं का विस्तार: युद्ध में रोबोटिक प्रणालियों की बढ़ती भूमिका उच्च जोखिम वाले अभियानों में मानवबल पर निर्भरता कम कर रही है।
- रोबोटिक प्रणालियों का उपयोग बारूदी सुरंगों की पहचान, निगरानी, टोही तथा रसद सहायता के लिए प्रभावी रूप से किया जा सकता है।
- निष्क्रिय रक्षा उपाय (Passive Defence Measures): आयरन डोम जैसी उन्नत रक्षा प्रणालियों के भी बड़े पैमाने पर हमलों के सामने सीमित होने से सक्रिय रक्षा प्रणालियों की सीमाएँ स्पष्ट हुई हैं।
- सैन्य संसाधनों का विकेंद्रीकरण, छलावरण, गोपनीयता तथा भूमिगत अवसंरचना जैसे निष्क्रिय रक्षा उपाय सैन्य शक्ति के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
निष्कर्ष
- आधुनिक युद्ध की प्रकृति यह मांग करती है कि प्लेटफॉर्म-केंद्रित दृष्टिकोण के स्थान पर क्षमता-आधारित तथा प्रौद्योगिकी-संचालित सैन्य योजना अपनाई जाए। भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष सुरक्षा तथा संयुक्त सैन्य सुधारों को तीव्र गति से आगे बढ़ाना होगा।
- विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के लिए मानव संसाधन, रक्षा नवाचार तथा रणनीतिक साझेदारियों में निरंतर निवेश आवश्यक होगा।
- तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की संप्रभुता, स्थिरता तथा रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए युद्ध की बदलती प्रकृति के अनुरूप स्वयं को ढालना अत्यंत आवश्यक है।
स्रोत: IE
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